डा. राज पाल
hindi
November 2025
भारतीय दर्शन की विविध परंपराओं में वेदान्त का स्थान अत्यंत विशिष्ट और केंद्रीय है। यह दर्शन न केवल ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति, संरचना और उद्देश्य को समझाने का प्रयास करता है, अपितु आत्मा की प्रकृति, उसकी ब्रह्म से एकता, और मोक्ष की दिशा को भी स्पष्ट करता है। वेदान्त के मूल में दो अत्यंत गूढ़ और परस्पर संबंधित अवधारणाएँ हैं — ब्रह्म और माया। ब्रह्म को परम तत्त्व, नित्य, निर्विकारी, सर्वव्यापक और चेतन सत्ता के रूप में स्वीकार किया गया है, जबकि माया को वह शक्ति माना गया है जो ब्रह्म की वास्तविकता को आवृत कर जीव को जगत की विविधता में उलझा देती है। यह शोधपत्र वेदान्त के तीन प्रमुख मतों — अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, और द्वैत — में ब्रह्म और माया की व्याख्या का तुलनात्मक और विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है। अद्वैत वेदान्त में शंकराचार्य ब्रह्म को ही एकमात्र सत्य मानते हैं, और माया को अविद्या के रूप में परिभाषित करते हैं, जो ब्रह्म के ज्ञान को ढकती है। विशिष्टाद्वैत वेदान्त में रामानुजाचार्य ब्रह्म को सगुण परमेश्वर के रूप में स्वीकार करते हैं, जिसमें जीव और जगत उसकी अभिन्न शक्तियाँ हैं। द्वैत वेदान्त में मध्वाचार्य ब्रह्म, जीव और माया को स्वतंत्र और वास्तविक सत्ता मानते हैं, जहाँ ब्रह्म की कृपा से ही जीव मुक्ति प्राप्त करता है।
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